Reconhecer
Reconhecer a Jesus como Senhor é o fundamento da fé cristã. A confissão de fé é o ato de declarar publicamente quem Jesus é e a quem pertencemos.
Confissão e salvação
Se confessarmos com a boca que Jesus é Senhor e crermos no coração que Deus o ressuscitou, seremos salvos.
कि यदि तु आपना मुय रईन ईशु क पोरबु जानीन अंगीकर करे आरू आपने मन रईन विश्वास करे, कि यहोवा–भगवान उको मरलाम रईन जीवाड़े, ते तुखे नक्कि उध्दार जुड़से।
विश्वास करने से आपनु यहोवा–भगवान क साथे सही संबंध मा आवता छे, ते विश्वास करने से खुद मुय करीन कोतारलीन छुटकारो जुड़तो छे।
काहकि लिखलो छे, "पोरबु कोवतु छे, मारा जीवनन सोगुन कि हर एक घुटना मारा सामने टिकछे, आरू हर एक जीभ यहोवा–भगवान काजे अंगीकार करसे।"
आरू यहोवा–भगवान बाकी महिमान करता
हर एक जीभ पछतावो कर लेय कि
ईशु मसीह ही पोरबु छे।
Reconhecer a fé
Reconhecer a Jesus é um ato de coragem e compromisso. Quem o confessar diante dos homens, Ele confessará diante do Pai.
जो काही यो मान लेता छे कि ईशु यहोवा–भगवान क पोर्य छे, यहोवा–भगवान उनमा बना रयता छे, आरू वो यहोवा–भगवान मा।
जो जित जाय उको धवळा छिंदरा पेहनाव सी, आरू हांव ओका नाव जीवन की किताब मा सी काहय सी भी नीहि काटू; पर उका नाव म्हारा बास आरू सोरगदूत क सामने मान दिस।
विश्वास की वारली कुश्ती लड़ाय आरू ओको अमरकाय जीवन क धर लेय, जिदरे करता तु बुलाया गया आरू घोणा छे गवा क सामने वारली पछतायो कर्या हुता।
आवु हामु आपसी आश क पछतायो क दृढ़ता छे थाहाव रया, काहकि जो प्रतिज्ञा करी छे वो सच छे।
Reconhecer o pecado e a bondade de Deus
Reconhecer nossos pecados é o caminho para o perdão. E reconhecer que o Senhor é nossa porção nos dá esperança inabalável.