19 अब शरीर के कार्य तो स्पष्ट हैं, अर्थात्5:19 कुछ हस्तलेखों में यहाँ "परस्त्रीगमन," लिखा है। व्यभिचार, अशुद्धता, कामुकता, 20 मूर्तिपूजा, जादू-टोना, बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, क्रोध, स्वार्थ, फूट, दलबंदी, 21 डाह,5:21 कुछ हस्तलेखों में यहाँ "हत्या," लिखा है। मतवालापन, रंगरेलियाँ, तथा ऐसे और भी कार्य हैं जिनके विषय में मैं तुम्हें पहले ही कह देता हूँ, जैसा मैं पहले भी कह चुका हूँ कि ऐसे कार्य करनेवाले परमेश्वर के राज्य के उत्तराधिकारी नहीं होंगे।
22 परंतु आत्मा का फल प्रेम, आनंद, शांति, धैर्य, कृपा, भलाई, विश्वासयोग्यता, 23 नम्रता और संयम है। ऐसी बातों के विरुद्ध कोई व्यवस्था नहीं है।