सच्ची दाखलता
1 "सच्ची दाखलता मैं हूँ, और मेरा पिता किसान है। 2 प्रत्येक डाली जो मुझमें है और फल नहीं लाती, उसे वह काटता है, और प्रत्येक जो फल लाती है उसे वह छाँटता है, ताकि और अधिक फल लाए। 3 अब तुम उस वचन के कारण जो मैंने तुमसे कहा है, शुद्ध हो। 4 तुम मुझमें बने रहो और मैं तुममें। जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आपसे फल नहीं ला सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझमें बने न रहो, तो फल नहीं ला सकते। 5 मैं दाखलता हूँ, तुम डालियाँ हो। जो मुझमें बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल लाता है, क्योंकि मुझसे अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते। 6 यदि कोई मुझमें बना न रहे, तो वह डाली के समान बाहर फेंक दिया जाता है और सूख जाता है, फिर लोग उन्हें इकट्ठा करके आग में झोंक देते हैं और वे जल जाती हैं। 7 यदि तुम मुझमें बने रहो और मेरे वचन तुममें बने रहें, तो जो चाहो माँगो और वह तुम्हारे लिए हो जाएगा। 8 मेरे पिता की महिमा इसी से होती है कि तुम बहुत फल लाओ और मेरे शिष्य बने रहो।15:8 कुछ हस्तलेखों में इस पद का अनुवाद इस प्रकार है : "... कि तुम बहुत सा फल लाओ, तभी तुम मेरे शिष्य होगे।"