3 तभी लोग एक लकवे के रोगी को चार लोगों से उठवाकर उसके पास ले आए। 4 परंतु जब वे भीड़ के कारण उसे यीशु के पास नहीं पहुँचा सके2:4 कुछ हस्तलेखों में "वे उसे यीशु के पास नहीं पहुँचा सके" के स्थान पर "वे यीशु के पास नहीं पहुँच सके" लिखा है। तो उन्होंने उस छत को, जिसके नीचे यीशु था, खोल दिया और खुली जगह बनाकर उस बिछौने को, जिस पर वह लकवे का रोगी पड़ा था, नीचे उतार दिया। 5 तब यीशु ने उनके विश्वास को देखकर उस लकवे के रोगी से कहा,"पुत्र, तेरे पाप क्षमा हुए।" 6 परंतु वहाँ कुछ शास्त्री बैठे हुए थे और वे अपने-अपने मन में विचार करने लगे, 7 "यह ऐसा क्यों बोल रहा है? यह तो परमेश्वर की निंदा कर रहा है! परमेश्वर को छोड़ और कौन पाप क्षमा कर सकता है?"
8 तब यीशु ने तुरंत अपने आत्मा में जानकर कि वे अपने मन में इस प्रकार विचार कर रहे हैं, उनसे कहा,"तुम अपने-अपने मन में क्यों यह विचार कर रहे हो? 9 सहज क्या है? लकवे के रोगी से यह कहना, ‘तेरे पाप क्षमा हुए’ या यह कहना, ‘उठ, अपना बिछौना उठा और चल फिर’? 10 अब इससे तुम जान जाओ कि मनुष्य के पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का अधिकार है," उसने उस लकवे के रोगी से कहा, 11 "मैं तुझसे कहता हूँ, उठ, अपना बिछौना उठा और अपने घर चला जा!" 12 वह उठा और तुरंत बिछौना उठाकर सब के सामने से बाहर निकल गया। इससे वे सब चकित हुए और परमेश्वर की महिमा करते हुए कहने लगे, "हमने ऐसा कभी नहीं देखा।"