राज्य के प्रति मसीही कर्त्तव्य
1 प्रत्येक व्यक्ति शासकीय अधिकारियों के अधीन रहे, क्योंकि कोई अधिकार ऐसा नहीं जो परमेश्वर की ओर से न हो, और जो अधिकारी हैं वे परमेश्वर के द्वारा नियुक्त हैं। 2 इसलिए जो अधिकार का विरोध करता है वह परमेश्वर की विधि का सामना करता है, और सामना करनेवाले अपने ऊपर दंड लाएँगे। 3 शासक अच्छे कार्य के लिए नहीं परंतु बुरे कार्य के लिए भय का कारण होते हैं। यदि तू अधिकारी से निर्भय रहना चाहता है तो वही कर जो अच्छा है, और उसकी ओर से तेरी प्रशंसा होगी; 4 क्योंकि वह तेरी भलाई के लिए परमेश्वर का सेवक है। परंतु यदि तू बुराई करे तो डर, क्योंकि वह व्यर्थ ही तलवार धारण नहीं करता। वह परमेश्वर का सेवक है, जो बुराई करनेवालों को उसके क्रोध के अनुसार दंड देता है। 5 अतः केवल क्रोध के कारण ही नहीं, बल्कि विवेक के कारण भी अधीन रहना आवश्यक है। 6 इसी कारण तुम कर भी चुकाते हो; क्योंकि अधिकारी परमेश्वर के सेवक हैं जो निरंतर इसी सेवा में लगे हैं। 7 जिसका तुम्हें कुछ चुकाना है उसे चुकाओ : जिसे कर चुकाना है उसे कर चुकाओ, जिसे चुंगी देनी है उसे चुंगी दो, जिससे डरना है उससे डरो, जिसका आदर करना है उसका आदर करो।