नबूकदनेस्सर का अपमान
28 यह सब कुछ नबूकदनेस्सर राजा पर घट गया4:28 यह सब कुछ नबूकदनेस्सर राजा पर घट गया: अर्थात् उस चेतावनी का दण्ड, उस रूप में आया जिसकी भविष्यद्वाणी की गई थी। उसने चेतावनी के अनुसार अपना जीवन न तो सुधारा न ही पश्चाताप किया और उसे दानिय्येल की सलाह का पालन करने का पर्याप्त समय भी हो गया था।। 29 बारह महीने बीतने पर जब वह बाबेल के राजभवन की छत पर टहल रहा था, तब वह कहने लगा, 30 "क्या यह बड़ा बाबेल नहीं है, जिसे मैं ही ने अपने बल और सामर्थ्य से राजनिवास होने को और अपने प्रताप की बड़ाई के लिये बसाया है?" 31 यह वचन राजा के मुँह से निकलने भी न पाया था कि आकाशवाणी हुई, "हे राजा नबूकदनेस्सर तेरे विषय में यह आज्ञा निकलती है कि राज्य तेरे हाथ से निकल गया, 32 और तू मनुष्यों के बीच में से निकाला जाएगा, और मैदान के पशुओं के संग रहेगा; और बैलों के समान घास चरेगा और सात काल तुझ पर बीतेंगे, जब तक कि तू न जान ले कि परमप्रधान, मनुष्यों के राज्य में प्रभुता करता है और जिसे चाहे वह उसे दे देता है।" 33 उसी घड़ी यह वचन नबूकदनेस्सर के विषय में पूरा हुआ। वह मनुष्यों में से निकाला गया, और बैलों के समान घास चरने लगा, और उसकी देह आकाश की ओस से भीगती थी, यहाँ तक कि उसके बाल उकाब पक्षियों के परों से और उसके नाखून चिड़ियाँ के पंजों के समान बढ़ गए।
नबूकदनेस्सर द्वारा परमेश्वर की प्रशंसा
34 उन दिनों के बीतने पर, मुझ नबूकदनेस्सर ने अपनी आँखें स्वर्ग की ओर उठाई, और मेरी बुद्धि फिर ज्यों की त्यों हो गई; तब मैंने परमप्रधान को धन्य कहा, और जो सदा जीवित है उसकी स्तुति और महिमा यह कहकर करने लगा:
उसकी प्रभुता सदा की है
और उसका राज्य पीढ़ी से पीढ़ी तब बना रहनेवाला है। (भज. 145:13, 1 तीमु. 1:17)
35 पृथ्वी के सब रहनेवाले उसके सामने तुच्छ गिने जाते हैं,
और वह स्वर्ग की सेना और पृथ्वी के रहनेवालों के बीच
अपनी इच्छा के अनुसार काम करता है;
और कोई उसको रोककर उससे नहीं कह सकता है, "तूने यह क्या किया है?"
36 उसी समय, मेरी बुद्धि फिर ज्यों की त्यों हो गई; और मेरे राज्य की महिमा के लिये मेरा प्रताप और मुकुट मुझ पर फिर आ गया। और मेरे मंत्री और प्रधान लोग मुझसे भेंट करने के लिये आने लगे, और मैं अपने राज्य में स्थिर हो गया; और मेरी और अधिक प्रशंसा होने लगी। 37 अब मैं नबूकदनेस्सर स्वर्ग के राजा को सराहता हूँ, और उसकी स्तुति और महिमा करता हूँ क्योंकि उसके सब काम सच्चे, और उसके सब व्यवहार न्याय के हैं; और जो लोग घमण्ड से चलते हैं, उन्हें वह नीचा कर सकता है। (व्यव. 32:4)