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Efésios 5

ें चल

1 इसलििबचों समपरमवर अनसरण करो; 2 और ें चलमसिा; और हमिअपनआपकखदयक गनिपरमवर आगेंकरकबलिकर िा। (. 13:34, गला. 2:20)

3 पविों ै, ें यभि, और िरकअश, चरतक ो। 4 और िलजजता, खततची, उपहि5:4 न निर्लज्जता, न मूर्खता की बातचीत की, न उपहास किया: इसका मतलब है कि इस प्रकार की बात जो फीकी, मूर्खतापूर्ण, बेवकूफ, मूढ़ जो उपदेश देने और सिखाने के लिए अनुकूल नहीं है।, ोंि ें नहीं ी, वरनधनयव5 ोंि यह नति ियभिी, अशजन, मनी, िजक बरबर ै, मसऔर परमवर ें िसत नहीं। 6 ें यरों े; ोंि इन ों रण परमवर आजननों पर भडकतै। 7 इसलिउनकसहभो।

ि ें चल

8 ोंि पहलधक5:8 तुम तो पहले अंधकार थे: यहाँ इसका अर्थ है, वे स्वयं ही विगत में अज्ञानता में डूबे हुए थे, और उसी घृणित कामों में अभ्यस्त थे। परनअब रभें ि ो, अति सनसमचलो। 9 (ोंि ि फल सब रकभल, और िकता, और सतै), 10 और यह परखो, ि रभै? 11 और धकिफल ों ें सहभो, वरनउन पर उलहनो। 12 ोंि उनकों चरलजै। 13 पर ितनों पर उलहनिसब ि रगट ैं, ोंि सब रगट करतै, वह ि ै। 14 इस रण वह कहतै,

"

और ों ें उठ;

मसि पर चमकी।" (. 13:11,12, यशा. 60:1)

ि ें चल

15 इसलिो, ि चलतो; ििों समनहीं पर िों समचलो। 16 और अवसर बहसमझो, ोंि िैं। (आमो. 5:13, ु. 4:5) 17 इस रण िि ो, पर समझो, ि रभइचै। 18 और खरस मतवबनो, ोंि इससचपन ै, पर पविआतपरि, (ि. 23:31,32, गला. 5:21-25) 19 और आपस ें भजन और िऔर आतिकरो, और अपने-अपनमन ें रभमनऔर ि करतरहो। (ु. 3:16, 1 ि. 14:26) 20 और सदसब ों िहमरभमसपरमवर िधनयवकरतरहो। 21 और मसभय एक सरअधरह5:21 एक दूसरे के अधीन रहो: जीवन के विभिन्न सम्बंधों में अधीनता को बनाए रखें।

पतिों और पतिों आद

22 पतिों, अपने-अपनपति ऐसअधरहो, रभे। (ु. 3:18, 1 पत. 3:1, उत. 3:16) 23 ोंि पति पतिि मसकलििै; और आप उदरकरै। 24 पर कलिमसअधै, पतिाँ हर ें अपने-अपनपति अधरहें।

25 पतिों, अपनी-अपनपतरखो, मसकलिकरकअपनआपकउसकििा, 26 ि उसकवचन जल 5:26 वचन के द्वारा जल के स्नान: यह बाहरी समारोहों के द्वारा नहीं किया गया था, और न हृदय पर कोई चमत्कारी शक्ति के द्वारा किया गया था, परन्तु मन पर सच्चाई की विश्वासयोग्यता से प्रयोग के द्वारा किया गया। करकपविबन, 27 और उसएक ऐसजसकलिबनकर अपनखड़ी करे, िसमें कल, ी, ऐसवसो, वरनपविऔर िो। 28 इसरकउचिै, ि पति अपनी-अपनपतअपनसमरखे, अपनपतरखतै, वह अपनआप रखतै। 29 ोंि िकभअपनशरनहीं रखवरनउसकलन-पषण करतै, मसकलिकरतै। 30 इसलिि हम उसकैं। 31 "इस रण ा-िकर अपनपतिरहा, और ों एक तन ोंे।" (उत. 2:24) 32 यह बड़ा ै; पर ैं मसऔर कलििषय ें कहतूँ। 33 पर ें हर एक अपनपतअपनसमरखे, और पतअपनपति भय े।

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