जन्म के अंधे को दृष्टिदान
1 फिर जाते हुए उसने एक मनुष्य को देखा, जो जन्म से अंधा था। 2 और उसके चेलों ने उससे पूछा, "हे रब्बी, किसने पाप किया था9:2 रब्बी, किसने पाप किया था: यह यहूदियों के बीच एक सार्वभौमिक विचार था कि सभी प्रकार की आपदा पाप के प्रभाव से होती थी। कि यह अंधा जन्मा, इस मनुष्य ने, या उसके माता पिता ने?" 3 यीशु ने उत्तर दिया, "न तो इसने पाप किया था, न इसके माता पिता ने परन्तु यह इसलिए हुआ, कि परमेश्वर के काम उसमें प्रगट हों। 4 जिसने मुझे भेजा है; हमें उसके काम दिन ही दिन में करना अवश्य है। वह रात आनेवाली है जिसमें कोई काम नहीं कर सकता। 5 जब तक मैं जगत में हूँ, तब तक जगत की ज्योति हूँ।" (यूह. 8:12) 6 यह कहकर उसने भूमि पर थूका और उस थूक से मिट्टी सानी, और वह मिट्टी उस अंधे की आँखों पर लगाकर। 7 उससे कहा, "जा, शीलोह के कुण्ड में धो ले" (शीलोह का अर्थ भेजा हुआ है) अतः उसने जाकर धोया, और देखता हुआ लौट आया। (यशा. 35:5) 8 तब पड़ोसी और जिन्होंने पहले उसे भीख माँगते देखा था, कहने लगे, "क्या यह वही नहीं, जो बैठा भीख माँगा करता था?" 9 कुछ लोगों ने कहा, "यह वही है," औरों ने कहा, "नहीं, परन्तु उसके समान है" उसने कहा, "मैं वही हूँ।" 10 तब वे उससे पूछने लगे, "तेरी आँखें कैसे खुल गईं?" 11 उसने उत्तर दिया, "यीशु नामक एक व्यक्ति ने मिट्टी सानी, और मेरी आँखों पर लगाकर मुझसे कहा, ‘शीलोह में जाकर धो ले,’ तो मैं गया, और धोकर देखने लगा।" 12 उन्होंने उससे पूछा, "वह कहाँ है?" उसने कहा, "मैं नहीं जानता।"