ख़ुदा की भरोसेमंदी में उम्मीद
1 मैं ही वह शख़्स हूँ जिसने उसके ग़ज़ब की लाठी से दुख पाया।
2 वह मेरा रहबर हुआ, और मुझे रौशनी में नहीं, बल्कि तारीकी में चलाया;
3 यक़ीनन उसका हाथ दिन भर मेरी मुख़ालिफ़त करता रहा।
4 उसने मेरा गोश्त और चमड़ा ख़ुश्क कर दिया,
और मेरी हड्डियाँ तोड़ डालीं,
5 उसने मेरे चारों तरफ़ दीवार खेंची
और मुझे कड़वाहट और — मशक़्क़त से घेर लिया;
6 उसने मुझे लम्बे वक़्त से मुर्दों की तरह तारीक मकानों में रख्खा।
7 उसने मेरे गिर्द अहाता बना दिया, कि मैं बाहर नहीं निकल सकता;
उसने मेरी ज़ंजीर भारी कर दी।
8 बल्कि जब मैं पुकारता और दुहाई देता हूँ,
तो वह मेरी फ़रियाद नहीं सुनता।
9 उसने तराशे हुए पत्थरों से मेरे रास्तेबन्द कर दिए,
उसने मेरी राहें टेढ़ी कर दीं।