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अम्साल 31:13-20,27

13 वह ऊन और कतान ढूंडती है,

और ख़ुशी के साथ अपने हाथों से काम करती है।

14 वह सौदागरों के जहाज़ों की तरह है,

वह अपनी ख़ुराक दूर से ले आती है।

15 वह रात ही को उठ बैठती है,

और अपने घराने को खिलाती है, और अपनी लौंडियों को काम देती है।

16 वह किसी खेत की बारे में सोचती हैऔर उसे ख़रीद लेती है;

और अपने हाथों के नफ़े' से ताकिस्तान लगाती है।

17 वह मज़बूती से अपनी कमर बाँधती है,

और अपने बाज़ुओं को मज़बूत करती है।

18 वह अपनी सौदागरी को सूदमंद पाती है।

रात को उसका चिराग़ नहीं बुझता।

19 वह तकले पर अपने हाथ चलाती है,

और उसके हाथ अटेरन पकड़ते हैं।

20 वह ग़रीबों की तरफ़ अपना हाथ बढ़ाती है, हाँ,

वह अपने हाथ मोहताजों की तरफ़ बढ़ाती है।

27 वह अपने घराने पर बख़ूबी निगाह रखती है,

और काहिली की रोटी नहीं खाती।

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