4 प्रेम सान्त रह हैं; अऊर दयालु रह हैं; प्रेम डाह नी करिये हैं: प्रेम अपनी बड़ाई नी करिये हैं अर घमण्ड नी करिये हैं, 5 उ अनरीति नी चल्ये हैं, उ अपनी भलो नी चय्हे, हैं झुझलाता नी हैं, बुरो नी माना हैं। 6 अधर्म को काम हुन 13:6 कुकरमसे खुसी नी होए हैं, पर सच्चो से खुसी होए हैं। 7 उ सारो बात हुन ढाँक लेवा हैं, सब बात हुन को भरोसा करा हैं, सब बात हुन को आसा रखा हैं, सब बात हुन म धीरज धरा हैं।
8 प्रेम कभी खत्म नी हैं; भविस्यव्दाणी हुन होए, ते खत्म हो जाहे।