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Colossenses 4

1 ि, अपनअपननउकर अर चलन रखो, समझ ि वरएक िैं।

यवहि सल

2 थनलगरहो, अऊर धनयवसतरक4:2 जागृत रहो; 3 अर ऐकहमथनकरतरहनि परमवर हमवचन असदरव4:3 व्दार े, ि हम मस4:3 भेद बतसके, ैं, 4 अर असबतसकू, जसकरनउचिैं।

5 मऊकिमतसमझ ियवहकरो। 6 वचन हमदयसहिअर सलि हर अदमबडिि उततर ि

आखरअभिदन

7 भई अर भरयक4:7 विस्वासयोग ; ि4:7 प्रेरितो। 20:4, तीमु। 4:12, रभैं, बते। 8 ऐकमरकनजयैं ि हमरदसचल अर मन ि े। 9 ओकउनििैं भरयक अर भई, अर ैं, ि बते।

10 अरितर, ैं, अऊर बरनबांमरकनमसकहव ैं। मरकआदिैं। अदि आये, उनकगत करे। 11 अर कहलैं, नमसकहव ैं। खतनिअदमपरमवर 4:11 सहकर्मी अर ि रन रह ैं।

12 इपफ, ैं अर मसैं, नमसकह ैं, अर हममरथनरयतकरह ैं, िभरपरमवर इचपर खडरहो। 13 ओकगवूँ मरअर लउदिअर ियरिसवबडहनत करतरह ैं। 14 अर नमसे।

15 लउदिभई , अर मफअर उन घर कलिनमसकहनू। 16 जब िमरपडिअसकरनलउदिकलिपढे। अर िलउदिआहपडनू। 17 अर अरखिकहजि रभगई, वधकरनो।

18 अपनिनमसे। बनधन मरण रखनू।

पर दयरहे। आम

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