21 "मैं तुम्हारे उत्सवों से घृणा करता हूं, उन्हें तुच्छ समझता हूं;
तुम्हारी सभाएं मेरे लिए एक दुर्गंध के समान हैं.
22 भले ही तुम मुझे होमबलि और अन्नबलि चढ़ाओ,
पर मैं उन्हें स्वीकार नहीं करूंगा.
भले ही तुम मुझे अपना मनपसंद मेल बलि चढ़ाओ,
पर मेरे लिये उनका कोई मतलब नहीं होगा.
23 दूर रखो मुझसे अपने गीतों का शोरगुल!
मैं तुम्हारे वीणा के संगीत को नहीं सुनूंगा.
24 पर न्याय को नदी के समान,
तथा धर्मीपन को कभी न सूखनेवाले सोते के समान बहने दो!