31 "हे महाराज, तेंह देखे कि तोर आघू म एक ठन बड़े मूरती ठाढ़े रिहिस—एक बहुंत बड़े, चकित करइया मूरती, जऊन ह दिखे म अद्भूत रिहिस। 32 ओ मूरती के मुड़ ह सुध सोन के बने रिहिस, ओकर छाती अऊ बाहांमन चांदी के, ओकर पेट अऊ जांघमन कांसा के, 33 ओकर गोड़मन लोहा के, ओकर पांवमन कुछू लोहा अऊ कुछू पकोय गय माटी के रिहिन। 34 जब तेंह देखत रहे, त एक चट्टान ह बिगर कोनो मनखे के कोसिस के अपनआप कटके अलग हो गीस अऊ ओ मूरती के लोहा अऊ माटी के बने पांवमन ला अइसने ठोकर मारिस कि ओमन चकनाचूर हो गीन। 35 तब लोहा, माटी, कांसा, चांदी अऊ सोन—जम्मो टूटके कुटा-कुटा हो गीन अऊ गरमी महिना म कोठार के भूंसा सहीं हो गीन। हवा ह ओमन ला अइसे उड़ाके ले गीस कि ओमन के कोनो छोटे टुकड़ा घलो नइं बचिस। पर जऊन चट्टान ह मूरती ला ठोकर मारे रिहिस, ओ चट्टान ह एक बहुंत बड़े पहाड़ बन गीस अऊ जम्मो धरती म फईल गीस।
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