अपन मन ला चीरव
12 "तभो ले अब," यहोवा ह घोसना करत हे,
"तुमन अपन पूरा मन से उपास करत
अऊ रोवत अऊ बिलाप करत मोर करा लहुंट आवव।"
13 अपन कपड़ामन ला नइं,
पर अपन मन ला चीरव।
यहोवा अपन परमेसर करा लहुंट आवव,
काबरकि ओह अनुग्रहकारी अऊ करूनामय,
गुस्सा करे म धीमा अऊ बहुंत मया करइया ए,
अऊ बिपत्ति भेजे म नमरता देखाथे।
14 कोन जाने? ओह अपन बिचार ला बदलके नमरता देखाय
अऊ अपन पाछू एक आसीस छोंड़ जाय—
यहोवा तुम्हर परमेसर बर
अन्न-बलिदान अऊ पेय-बलिदान।
15 सियोन म तुरही फूंकव,
एक पबितर उपास के घोसना करव,
एक पबितर सभा करव।
16 मनखेमन ला इकट्ठा करव,
सभा ला पबितर करव;
अगुवामन ला एक संग लानव,
लइकामन ला, दूध पीयइया छोटे लइकामन ला
इकट्ठा करव।
दूल्हा अपन कमरा ला
अऊ दुलहिन अपन कोठरी ला छोंड़के बाहिर आवंय।
17 पुरोहित, जेमन यहोवा के आघू म सेवा करथें,
मंडप अऊ बेदी के बीच म रोवंय।
ओमन कहंय, "हे यहोवा, अपन मनखेमन ला बचा।
अपन खुद के मनखेमन ला जाति-जाति के मनखेमन के बीच म
ठट्ठा के बिसय, एक कहावत झन बना।
ओमन मनखेमन के बीच म काबर कहंय,
‘कहां हवय ओमन के परमेसर?’ "