परमेसर के सेवा म जिनगी
1 एकरसेति, हे भाईमन हो! परमेसर के दया के कारन, मेंह तुम्हर ले बिनती करत हंव कि अपन देहें ला जीयत बलिदान के रूप म परमेसर ला दे दव अऊ अपनआप ला निस्कलंक बनाके परमेसर के अइसने सेवा करव कि ओह खुस होवय—एहीच ह परमेसर बर तुम्हर सही अराधना अय। 2 तुमन ये संसार के मनखेमन सहीं झन बनव, पर तुमन के मन ह नवां हो जाय के कारन, तुम्हर चालचलन घलो बदल जावय। तब तुमन परमेसर के ओ ईछा ला परखके जान सकहू जऊन ह बने, मनभावन अऊ सिद्ध अय।