लोभ अऊ परिछा
2 हे मोर भाईमन, जब तुम्हर ऊपर नाना किसम के परिछा आथे, त येला बड़े आनंद के बात समझव, 3 काबरकि तुमन जानत हव कि तुम्हर बिसवास के परखे जाय ले तुम्हर धीरज ह बढ़थे। 4 पर धीरज ला अपन काम करन दव कि तुमन परिपक्व अऊ सिद्ध हो जावव अऊ तुमन म कोनो बने बात के कमी झन रहय।
12 धइन ए ओ मनखे, जऊन ह जिनगी के परिछा म डोले नइं; काबरकि ओह चोखा निकलके जिनगी के ओ मुकुट ला पाही, जेकर वायदा परभू ह अपन मया करइयामन ले करे हवय।
13 जब काकरो परिछा होथे, त ओह ये झन कहय कि मोर परिछा परमेसर ह करत हवय, काबरकि न तो खराप बात ले परमेसर के परिछा हो सकथे अऊ न ही ओह काकरो परिछा खुद करथे। 14 पर हर एक मनखे अपनेच खराप ईछा के कारन फंसथे अऊ परिछा म पड़थे। 15 तब खराप ईछा ह बढ़के पाप ला जनमथे अऊ जब पाप ह बढ़ जाथे, त मनखे के मिरतू हो जाथे।