हबकूक गूरै खोज़ी बिधाता का खरी
2 "ए बिधाता, हुंह केभै तैणीं रहूं ताखा
लेर-पकार पाई मज़त मांगदअ लागी? ताह केभै तैणीं निं मेरी शुणनी?
हुंह रहअ ज़ोरै-ज़ोरै बोल्दअ, ‘ज़ुल्म हुअ, ज़ुल्म हुअ!’
तूह निस्सअ हाम्हां बच़ाऊई आथी!
3 तंऐं किल्है रहैऊऐ मुखा ईंयां घोर उपद्रभ?
बूरअ करनै आल़ै कदुष्ट मणछा लै तूह सज़ा किल्है निं दैंदअ?
तूह किल्है दैआ इहअ हणैं?
मणछ आसा नर्दैई हुऐ दै! सारै दी आसा ज़ुल्म अर उपद्रभ!
हर ज़ैगा आसा झ़गल़ै अर काट-मार!