दुनिया से दोस्ती
1 तुम्मैं लड़ाई और झगड़ा कहाँ से आथैं? का बे सुख विलासन से नाय जो तुमरे आँगन मैं लड़थै-भिड़थै? 2 तुम लालसा रखथौ, और तुमकै मिलत नाय है; तुम हत्या और डाह करथौ, कछु पाए नाय सकथौ; तुम झगड़थौ और लड़थौ; तुमकै जहे बजह से नाय मिलथै कि तुम मांगत नाय हौ। 3 तुम मांगत हौ और पात नाय हौ, काहैकि बुरी इच्छा से मांगत हौ, ताकी अपने भोग विलास मैं उड़ाए देबौ। 4 हे व्यभिचारियौ का तुम नाय जानथौ, कि दुनिया से दोस्ती करनो परमेस्वर से बैर करनो है? काहैकि जो कोई दुनिया से दोस्ती करनो चाहथै, बौ अपने आपकै परमेस्वर को बैरी बनाथै। 6 लेकिन परमेस्वर जो अनुग्रह देथै बौ और भी जाधे सक्तिसाली होथै। जौ बजह से सास्त्र कहथै, "परमेस्वर अभिमान करन बारे से बिरोध करथै, लेकिन भोले के ऊपर अनुग्रह करथै।" 7 काहैकि परमेस्वर के अधीन हुई जाबौ; और सैतान को सामना करौ, तौ बौ तुमरे झोने से भाज जागो। 8 परमेस्वर के झोने आबौ, तौ बौ भी तुमरे झोने आगो: हे पापियौ, अपने हात सुद्ध करौ; और हे दुई चित्तेयौ अपने दिल कै पवित्र करौ। 9 दुखी होबौ, और सोक करौ, और रोबौ, तुमरी हँसी सोक मैं और तुमरी खुसी उदासी मैं बदल जाबै। 10 प्रभु के सामने भोले बनौ, तौ बौ तुमकै सिरोमड़ीं बनागो।