2 ऐ रब, मैं मज़ीद कब तक मदद के लिए पुकारूँ? अब तक तूने मेरी नहीं सुनी। मैं मज़ीद कब तक चीख़ें मार मारकर कहूँ कि फ़साद हो रहा है? अब तक तूने हमें छुटकारा नहीं दिया। 3 तू क्यों होने देता है कि मुझे इतनी नाइनसाफ़ी देखनी पड़े? लोगों को इतना नुक़सान पहुँचाया जा रहा है, लेकिन तू ख़ामोशी से सब कुछ देखता रहता है। जहाँ भी मैं नज़र डालूँ, वहाँ ज़ुल्मो-तशद्दुद ही नज़र आता है, मुक़दमाबाज़ी और झगड़े सर उठाते हैं।
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