4 तू कहाँ था जब मैंने ज़मीन की बुनियाद रखी? अगर तुझे इसका इल्म हो तो मुझे बता! 5 किसने उस की लंबाई और चौड़ाई मुक़र्रर की? क्या तुझे मालूम है? किसने नापकर उस की पैमाइश की? 6 उसके सतून किस चीज़ पर लगाए गए? किसने उसके कोने का बुनियादी पत्थर रखा, 7 उस वक़्त जब सुबह के सितारे मिलकर शादियाना बजा रहे, तमाम फ़रिश्ते ख़ुशी के नारे लगा रहे थे?
8 जब समुंदर रहम से फूट निकला तो किसने दरवाज़े बंद करके उस पर क़ाबू पाया? 9 उस वक़्त मैंने बादलों को उसका लिबास बनाया और उसे घने अंधेरे में यों लपेटा जिस तरह नौज़ाद को पोतड़ों में लपेटा जाता है। 10 उस की हुदूद मुक़र्रर करके मैंने उसे रोकने के दरवाज़े और कुंडे लगाए। 11 मैं बोला, ‘तुझे यहाँ तक आना है, इससे आगे न बढ़ना, तेरी रोबदार लहरों को यहीं रुकना है।’
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