7 अपने बापदादा के ज़माने से लेकर आज तक तुमने मेरे अहकाम से दूर रहकर उन पर ध्यान नहीं दिया। रब्बुल-अफ़वाज फ़रमाता है कि मेरे पास वापस आओ! तब मैं भी तुम्हारे पास वापस आऊँगा।
लेकिन तुम एतराज़ करते हो, ‘हम क्यों वापस आएँ, हमसे क्या सरज़द हुआ है?’ 8 क्या मुनासिब है कि इनसान अल्लाह को ठगे? हरगिज़ नहीं! लेकिन तुम लोग यही कुछ कर रहे हो। तुम पूछते हो, ‘हम किस तरह तुझे ठगते हैं?’ इसमें कि तुम मुझे अपनी पैदावार का दसवाँ हिस्सा नहीं देते। नीज़, तुम इमामों को क़ुरबानियों का वह हिस्सा नहीं देते जो उनका हक़ बनता है। 9 पूरी क़ौम मुझे ठगती रहती है, इसलिए मैंने तुम पर लानत भेजी है।"
10 रब्बुल-अफ़वाज फ़रमाता है, "मेरे घर के गोदाम में अपनी पैदावार का पूरा दसवाँ हिस्सा जमा करो ताकि इसमें ख़ुराक दस्तयाब हो। मुझे इसमें आज़माकर देखो कि मैं अपने वादे को पूरा करता हूँ कि नहीं। क्योंकि मैं तुमसे वादा करता हूँ कि जवाब में मैं आसमान के दरीचे खोलकर तुम पर हद से ज़्यादा बरकत बरसा दूँगा।" 11 रब्बुल-अफ़वाज फ़रमाता है, "मैं कीड़ों को तुम्हारी फ़सलों से दूर रखूँगा ताकि तुम्हारे खेतों की पैदावार और तुम्हारे अंगूर ख़राब न हो जाएँ बल्कि पक जाएँ।