8 अपने रास्ते उससे दूर रख, उसके घर के दरवाज़े के क़रीब भी न जा। 9 ऐसा न हो कि तू अपनी ताक़त किसी और के लिए सर्फ़ करे और अपने साल ज़ालिम के लिए ज़ाया करे। 10 ऐसा न हो कि परदेसी तेरी मिलकियत से सेर हो जाएँ, कि जो कुछ तूने मेहनत-मशक़्क़त से हासिल किया वह किसी और के घर में आए। 11 तब आख़िरकार तेरा बदन और गोश्त घुल जाएंगे, और तू आहें भर भरकर 12 कहेगा, "हाय, मैंने क्यों तरबियत से नफ़रत की, मेरे दिल ने क्यों सरज़निश को हक़ीर जाना? 13 हिदायत करनेवालों की मैंने न सुनी, अपने उस्तादों की बातों पर कान न धरा। 14 जमात के दरमियान ही रहते हुए मुझ पर ऐसी आफ़त आई कि मैं तबाही के दहाने तक पहुँच गया हूँ।"
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