13 क्योंकि "जो भी ख़ुदावंद का नाम लेगा नजात पाएगा।"
14 लेकिन वह किस तरह उसे पुकार सकेंगे अगर वह उस पर कभी ईमान नहीं लाए? और वह किस तरह उस पर ईमान ला सकते हैं अगर उन्होंने कभी उसके बारे में सुना नहीं? और वह किस तरह उसके बारे में सुन सकते हैं अगर किसी ने उन्हें यह पैग़ाम सुनाया नहीं? 15 और सुनानेवाले किस तरह दूसरों के पास जाएंगे अगर उन्हें भेजा न गया? इसलिए कलामे-मुक़द्दस फ़रमाता है, "उनके क़दम कितने प्यारे हैं जो ख़ुशख़बरी सुनाते हैं।" 16 लेकिन सबने अल्लाह की यह ख़ुशख़बरी क़बूल नहीं की। यों यसायाह नबी फ़रमाता है, "ऐ रब, कौन हमारे पैग़ाम पर ईमान लाया?" 17 ग़रज़, ईमान पैग़ाम सुनने से पैदा होता है, यानी मसीह का कलाम सुनने से।