A mulher sábia
A mulher sábia constrói sua casa sobre o fundamento do temor do Senhor. Sua sabedoria abençoa a família, a comunidade e as gerações futuras.
A sabedoria que edifica
A mulher sábia edifica sua casa. O temor do Senhor é o princípio da sabedoria e a instrução que conduz à honra.
बुद्धिमान स्त्री अपने घर को बनाती है,
परंतु मूर्ख स्त्री उसे अपने ही
हाथों से उजाड़ देती है।
यहोवा का भय मानना बुद्धि का आरंभ है,
और परमपवित्र को जानना ही समझ है।
यहोवा का भय मानने से बुद्धि प्राप्त होती है,
और आदर प्राप्त होने से पहले नम्रता आती है।
तुममें से यदि किसी को बुद्धि की कमी हो तो वह परमेश्वर से माँगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है, और वह उसे दी जाएगी।
Virtude e excelência
A mulher virtuosa é coroada de força e dignidade. Ela abre a boca com sabedoria e a instrução da bondade está na sua língua.
गुणी पत्नी कौन पा सकता है?
उसका मूल्य तो रत्नों से भी बहुत अधिक है।
वह बल और सम्मान से सुसज्जित है,
और हँसकर आने वाले दिन का सामना करती है।
उसके मुँह से बुद्धि की बात निकलती है,
और उसकी जीभ पर कृपा की शिक्षा रहती है।
उसके बच्चे उठकर उसे धन्य कहते हैं।
उसका पति भी यह कहकर उसकी प्रशंसा करता है :
"बहुत सी स्त्रियाँ भले कार्य करती हैं,
पर तू उन सब से श्रेष्ठ है।"
आकर्षण तो झूठा और सुंदरता व्यर्थ है,
परंतु जो स्त्री यहोवा का भय मानती है,
उसी की प्रशंसा होगी।
गुणी पत्नी अपने पति का मुकुट है,
परंतु निर्लज्ज पत्नी उसकी हड्डियों की सड़ाहट के समान है।
कृपालु स्त्री सम्मान प्राप्त करती है,
जबकि निर्दयी मनुष्य धन को झपट लेते हैं।
घर और धन तो पूर्वजों से प्राप्त होते हैं,
परंतु बुद्धिमान पत्नी यहोवा ही से मिलती है।
Exemplo e influência
A mulher sábia é exemplo de fé e bom testemunho. Suas atitudes inspiram e seu legado abençoa as gerações que virão.
इसी प्रकार वृद्ध स्त्रियों का आचरण भी पवित्र हो। वे न तो दोष लगानेवाली और न ही पियक्कड़ हों, बल्कि अच्छी बातें सिखानेवाली हों, ताकि वे जवान स्त्रियों को सिखा सकें कि वे अपने-अपने पति और बच्चों से प्रीति रखनेवाली, समझदार, पवित्र आचरण रखनेवाली, कुशल गृहणी, भली और अपने-अपने पति के अधीन रहनेवाली हों, जिससे परमेश्वर के वचन की निंदा न हो।
इसी प्रकार उनकी पत्नियाँ भी सम्माननीय हों; दोष लगानेवाली नहीं बल्कि संयमी और सब बातों में विश्वासयोग्य हों।
"स्वर्ग का राज्य उन दस कुँवारियों के समान होगा जो अपनी-अपनी मशालें लेकर दूल्हे से मिलने के लिए निकलीं। उनमें पाँच मूर्ख और पाँच बुद्धिमान थीं। मूर्खों ने अपनी मशालों को तो लिया पर अपने साथ तेल नहीं लिया; परंतु बुद्धिमानों ने अपनी मशालों के साथ कुप्पियों में तेल भी लिया। जब दूल्हे के आने में देर हो रही थी, तो वे सब ऊँघने लगीं और सो गईं। आधी रात को पुकार हुई, ‘देखो दूल्हा आ रहा है, उससे मिलने चलो।’ तब उन सब कुँवारियों ने उठकर अपनी-अपनी मशालें तैयार कीं। तब मूर्खों ने बुद्धिमानों से कहा, ‘अपने तेल में से कुछ हमें भी दे दो, क्योंकि हमारी मशालें बुझ रही हैं।’ इस पर बुद्धिमानों ने कहा, ‘नहीं, यह हमारे और तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं होगा; अच्छा होगा कि तुम बेचनेवालों के पास जाकर अपने लिए खरीद लो।’ जब वे खरीदने जा रही थीं कि दूल्हा आ पहुँचा, और जो कुँवारियाँ तैयार थीं, वे उसके साथ विवाह के घर में चली गईं और द्वार बंद कर दिया गया। इसके बाद वे अन्य कुँवारियाँ भी आईं और कहने लगीं, ‘हे स्वामी, हे स्वामी! हमारे लिए द्वार खोल दे।’ इस पर उसने कहा, ‘मैं तुमसे सच कहता हूँ, मैं तुम्हें नहीं जानता।’ इसलिए जागते रहो, क्योंकि तुम न तो उस दिन को और न ही उस घड़ी को जानते हो।