Transformação
A transformação é o fruto natural de uma vida entregue a Deus. Ele não nos deixa como nos encontra — renova nossa mente, purifica nosso caráter e nos conforma à imagem de Cristo.
O chamado ao arrependimento
A transformação começa com o arrependimento genuíno. Deus convida cada pessoa a voltar-se para Ele de todo o coração e receber vida nova.
उ बखत से यीसु प्रचार करन अर या खबर सुनान लग गयो, "मन फिराव, काहेकि स्वर्ग को राज्य नजीक आ गयो हैं।"
पतरस न ओसे कहयो, "मन फिराओ, अर अपना पाप हुन माफी पान को लाने तुम म से हर एक ख यीसु मसी क नाम से बपतिस्मा लेनू चहिए; अर तुम ख परमेस्वर को सुध्द आत्मा को वरदान मिलेगो।
ऐको लाने मन फिराओ अर परमेस्वर कि ओर लोउट आओ ताकि तुम्हारो पाप ख माप कियो जाहे,
Renovação da mente
Paulo nos exorta a não nos conformar com o mundo, mas a sermos transformados pela renovação do entendimento. A mudança vem de dentro para fora.
अर यू दुनिया को सदस्य नी बन; पर तुमारी मन का नयो हो जानू से तुमारी चाल चलन भी बदलतो जाहे, जे से तुम परमेस्वर कि भली, अर भावती, अर पसंन्द, अर अच्छी परख अनुभव से मालूम कर सका हैं।
पर जब हम पूरा झन का उघाड़ा मुडा से प्रभु को तेज असो तरीका से प्ररगट होए हैं, ते प्रभु को दुवारा जो आत्मा आय, हम ओकी चमकिलो रूप म थोड़ो थोड़ो कर ख बदल जाय हैं।
ऐको लाने अपनो उ आग ख मार डाले जे जमीन पर हैं, छिनाला करन वाली असुध्द, बुरो काम, बुरी इकछा अर लोब ख जे मूर्ति पूजा को बराबर हैं।
Os frutos da transformação
Uma vida transformada produz o fruto do Espírito: amor, alegria, paz, paciência, benignidade, bondade, fidelidade, mansidão e domínio próprio.
पर आत्मा को फल प्रेम, खुसी, सान्ति, सबर, किरपा, भलाई, भरोसा, भोलो पन नमरता, अऊर संयम हैं असा-असा काम हुन को बदला विरोध म कोई भी नेम नी हाय।
अरे भई अर बहिन, मी तुम से हमारो प्रभु यीसु मसी का नाम से विनती करू हैं कि तुम सारा एक ही बात कह, अऊर तुम म फूट नी होय, पर एक ही मन अऊर एक ही मत हो ख मिलो रह।
प्रभु तुमरो मन हुन ख परमेस्वर को प्रेम अर मसी को धीरज की तरफ अगुवाई करे।
काहेकि तब हम कमजोर हुन ही हता, ते मसी अच्छी बखत पर भक्तिहीन का लाने मरो।
पर जो मोरो दियो वालो पानी पीए कोई उ पानी म से पिहेगो जो मी ओखा देऊ, उ फिर अनन्त काल को जीवन लक प्यासो नी रहन को; पर जो पानी मी ओखा देऊ, उ ओमा एक झिरिया सो बन जाहे जे अनन्त जीवन को लाने हमेसा उमंड़तो रहेगो।"