46 वे हरेक दिन एक मन होकै मन्दर म्ह कठ्ठे होवै थे, घर-घर रोट्टी तोड़दे होए खुशी अर मन की सिधाई तै खाणा खावै थे,
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46 वे हरेक दिन एक मन होकै मन्दर म्ह कठ्ठे होवै थे, घर-घर रोट्टी तोड़दे होए खुशी अर मन की सिधाई तै खाणा खावै थे,
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