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सभोपदेशक 4:6-8

6 चैन की गैल एक मुट्ठी उन दो मुट्ठियाँ तै आच्छी सै, जिनकी गैल मेहनत अर हवा नै पकड़णा हो।

7 फेर मन्‍नै सूरज कै नीच्‍चै यो भी बेकार बात देक्खी। 8 कोए एक्ला रहवै अर उसका कोए न्ही सै; ना उसका बेट्टा सै, ना भाई सै, फेर भी उसकी मेहनत का अन्त न्ही होन्दा; ना उसकी आँख धन तै छिकदी, अर ना वो कहवै सै, मै किसकी खात्तर मेहनत करुँ अर अपणी जिन्दगी नै दुखी राक्खूँ सूं? यो भी बेकार अर कती दुख भरया काम सै।

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