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1 Tessalonicenses 4

यहा–भगवकरनवन

1 एरकरईस, आरबहनवनकरतआररबईशसमझि लनआरयहा–भगवकरनिे, आरलत, ओसआरबढ2 हकि नति रबईशि आरिआपी। 3 हकि यहा–भगवि मरजि खलबना; आरयभिरया, 4 आरहर एक खलआरिआपनयर यवहकरने। 5 आरी, आरआरउन ि समझ यहा–भगवनत6 आरकयईसठगनआरओकपर यहभगवसब तन िे, ि हलकय रयु। 7 हकि यहा–भगविटळ वनकरती, खलयनकरते। 8 इनरण इननतयहा–भगवनते, आपसखलआते।

9 ईचि िषय ि मरिहकि आपस ोंखनआप यहा–भगविे। 10 आरसब मकििसब ईस करतईस, आरबहनसमझति आरबढ11 आरे, ओसपचरयनआरआपनो–आपनकरनआरआपने–आपनकमयनिकरू। 12 ि हरतििकरआरसमि घट

ईशआवन

13 ईस, आरबहननति ओकिषय मरले, िनअकलिरयो; ओसि िसरमनकर्‍आश ी। 14 हकि यदि िकरति ईशमरलआरउठ, ओसयहा–भगवईशमरलगये, आवसे। 15 हकि रबवचन कयति वतआररबआवनतक रये, कदअगबडछे। 16 हकि रबआप रग उतरसे; उनललक, आररधओवमवे, आरयहा–भगवि हऱी े; आरमसमरले, हल वन उठसे। 17 तव वतआरवछओकदवपर उठि हवरबिो; आरइनि सदरबवछे। 18 इनरकइन एक िसरबढ़ािकरो।

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