3 स्वार्थ से या अहंकार से कुछ न करो, बल्कि दीनता से दूसरों को अपने से श्रेष्ठ समझो, 4 प्रत्येक व्यक्ति अपने हित का ही नहीं, बल्कि दूसरों के हित का भी ध्यान रखे।
मसीह की दीनता और महानता
5 तुममें वही स्वभाव हो जो मसीह यीशु में था, 6 जिसने परमेश्वर के स्वरूप में होते हुए भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा, 7 बल्कि अपने को शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप लेकर मनुष्य की समानता में हो गया। 8 उसने मनुष्य रूप में प्रकट होकर अपने आपको दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ क्रूस की मृत्यु भी सह ली।