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मत्ती रचित सुसमाचार 18:23-35

23 इसलिए स्वर्ग का राज्य उस राजा के समान है, जिसने अपने दासों से लेखा लेना चाहा। 24 जब वह लेखा लेने लगा तो उसके सामने एक जन को लाया गया जिस पर दस हज़ार तोड़ों18:24 1 तोड़ा लगभग 6,000 दीनार के बराबर था और एक दीनार एक दिन की मज़दूरी थी।का ऋण था। 25 परंतु उसके पास चुकाने के लिए कुछ नहीं था, तो स्वामी ने आदेश दिया कि उसको तथा उसकी पत्‍नी और बच्‍चों और जो कुछ भी उसके पास है, सब बेचकर ऋण चुकाया जाए। 26 तब उस दास ने गिरकर उसे दंडवत् किया और कहने लगा, ‘18:26 कुछ हस्तलेखों में यहाँ "स्वामी" लिखा है।धीरज धर, मैं तेरा सब कुछ चुका दूँगा।’ 27 तब उस दास के स्वामी ने तरस खाकर उसे छोड़ दिया, और उसका ऋण भी क्षमा कर दिया। 28 परंतु जब वह दास बाहर निकला तो उसे अपना एक संगी दास मिला जो उसके एक सौ दीनार18:28 दीनार : एक दीनार एक दिन की मज़दूरी के बराबर था।का ऋणी था; तब वह उसे पकड़कर उसका गला दबाने लगा और कहा, ‘तुझ पर जो भी ऋण है, उसे चुका दे।’ 29 इस पर उसका संगी दास18:29 कुछ हस्तलेखों में यहाँ "उसके पैरों पर" लिखा है।गिरकर उससे विनती करने लगा, ‘धीरज धर, मैं तुझे सब चुका दूँगा।’ 30 परंतु वह नहीं माना बल्कि जाकर उसे तब तक के लिए बंदीगृह में डाल दिया जब तक वह ऋण न चुका दे। 31 इसलिए जो कुछ हुआ उसे देखकर उसके संगी दास बहुत उदास हुए; और उन्होंने जाकर अपने स्वामी को जो कुछ हुआ था वह सब बताया। 32 तब उसके स्वामी ने उसे बुलाकर उससे कहा, ‘अरे दुष्‍ट दास, तूने मुझसे विनती की, इसलिए मैंने तेरा वह सारा ऋण क्षमा कर दिया था; 33 जैसे मैंने तुझ पर दया की, क्या तुझे भी अपने संगी दास पर दया नहीं करनी चाहिए थी?’ 34 और उसके स्वामी ने क्रोध में आकर उसे यातना देनेवालों के हाथ तब तक के लिए सौंप दिया जब तक वह उसका सारा ऋण न चुका दे। 35 यदि तुममें से प्रत्येक अपने भाई18:35 कुछ हस्तलेखों में यहाँ "के अपराधों" लिखा है।को मन से क्षमा नहीं करेगा, तो मेरा स्वर्गिक पिता भी तुम्हारे साथ ऐसा ही करेगा।"

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