अंगूर के बगीचे के मज़दूरों का दृष्टांत
1 "स्वर्ग का राज्य किसी घर के एक स्वामी के समान है जो भोर को निकला कि अपने अंगूर के बगीचे में मज़दूरों को काम पर लगाए; 2 उसने मज़दूरों के साथ एक दीनार की दिहाड़ी तय करके उन्हें अपने अंगूर के बगीचे में भेजा। 3 फिर लगभग नौ बजे20:3 अक्षरशः तीसरे घंटे (मत्ती 14:25 का फुटनोट देखें)जब वह निकला तो उसने दूसरों को बाज़ार में बेकार खड़े देखा; 4 और उसने उनसे कहा, ‘तुम भी अंगूर के बगीचे में जाओ, और जो उचित होगा, मैं तुम्हें दूँगा।’ 5 और वे चले गए। फिर जब वह लगभग बारह बजे और तीन बजे निकला तो उसने वैसा ही किया। 6 फिर लगभग पाँच बजे जब वह निकला तो उसने और दूसरों को20:6 कुछ हस्तलेखों में यहाँ "बेकार" लिखा है।खड़े पाया, और उनसे कहा, ‘तुम यहाँ दिन भर बेकार क्यों खड़े रहे?’ 7 उन्होंने उससे कहा, ‘क्योंकि किसी ने हमें मज़दूरी पर नहीं लगाया।’ उसने उनसे कहा, ‘तुम भी अंगूर के बगीचे में जाओ20:7 कुछ हस्तलेखों में यहाँ "और जो कुछ उचित होगा तुम्हें मिलेगा" लिखा है।।’ 8 संध्या होने पर अंगूर के बगीचे के स्वामी ने अपने प्रबंधक से कहा, ‘मज़दूरों को बुला और अंत में आनेवालों से लेकर पहले आनेवालों तक सब को मज़दूरी दे।’ 9 संध्या के लगभग पाँच बजे आनेवालों को एक-एक दीनार मिला। 10 तब पहले आनेवालों ने सोचा कि हमें अधिक मिलेगा, परंतु उन्हें भी एक-एक दीनार मिला। 11 उसे लेने के बाद वे घर के स्वामी पर कुड़कुड़कर कहने लगे, 12 ‘अंत में आनेवालों ने तो एक ही घंटा कार्य किया, फिर भी तूने उन्हें हमारे बराबर कर दिया जिन्होंने दिन भर के बोझ और गर्मी को सहा।’ 13 इस पर उसने उनमें से एक से कहा, ‘मित्र, मैं तुझ पर अन्याय नहीं कर रहा हूँ; क्या तूने मेरे साथ एक दीनार में दिहाड़ी तय नहीं की थी? 14 अपना दीनार उठा और चला जा; यह मेरी इच्छा है कि मैं अंत में आनेवालों को भी उतना ही दूँ जितना तुझे दिया है। 15 क्या यह उचित नहीं कि मैं अपनी वस्तुओं के साथ जैसा चाहता हूँ वैसा करूँ? क्या मेरा भला होना तेरी आँख में खटकता है?’ 16 इस प्रकार जो अंतिम हैं, वे प्रथम होंगे और जो प्रथम हैं, वे अंतिम होंगे।20:16 कुछ हस्तलेखों में यहाँ "बुलाए हुए तो बहुत हैं, पर चुने हुए थोड़े हैं।" लिखा है।"