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मत्ती रचित सुसमाचार 24

ि्‍सयअवि्‍सय

45 "िऐसि्‍सयऔर ििउसकअपनकरों ऊपर ि्‍िि उनें उचिसमय पर जन े? 46 धनवह िउसकआकर ऐसकरत 47 ैं मससच कहतूँ ि वह उसअपनपति पर अधिि्‍करा। 48 परयदि वह ्‍और अपनमन ें कहे, आनें ै।’ 49 और वह अपनों टनलगे, और ियक्‍‍कड़ों ए-प, 50 उस ऐसिआएगजब वह उसकरतनहीं करतऔर ऐसघड़िवह नहीं नता; 51 और उसवह कठऔर उसकिों ठहरएगा, जहाँ और ाँों सना।"

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