शत्रुओं से प्रेम
43 "तुमने सुना है कि कहा गया था : तू अपने पड़ोसी से प्रेम रखना 5:43 लैव्य 19:18 , और अपने शत्रु से घृणा करना। 44 परंतु मैं तुमसे कहता हूँ, अपने शत्रुओं से प्रेम रखो और5:44 कुछ हस्तलेखों में यहाँ "जो तुम्हें शाप देते हैं उन्हें आशिष दो, जो तुमसे घृणा करते हैं उनके साथ भला करो," लिखा है।जो5:44 कुछ हस्तलेखों में यहाँ "तुम्हारा अपमान करते और" लिखा है।तुम्हें सताते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो, 45 ताकि तुम अपने पिता की, जो स्वर्ग में है, संतान बन जाओ क्योंकि वह भले और बुरे दोनों पर अपना सूर्य उदय करता है, और धर्मी और अधर्मी दोनों पर मेंह बरसाता है। 46 क्योंकि यदि तुम उन्हीं से प्रेम रखो जो तुमसे प्रेम रखते हैं, तो तुम्हारा क्या प्रतिफल होगा? क्या कर वसूलनेवाले भी ऐसा नहीं करते? 47 यदि तुम अपने भाइयों का ही अभिवादन करते हो, तो कौन सा बड़ा कार्य करते हो? क्या गैरयहूदी5:47 कुछ हस्तलेखों में "गैरयहूदी" के स्थान पर "कर वसूलनेवाले" लिखा है।भी ऐसा नहीं करते? 48 इसलिए तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गिक पिता सिद्ध है।