संसार से मित्रता
1 तुम्हारे बीच में लड़ाइयाँ और झगड़े कहाँ से आए? क्या यह उन लालसाओं के कारण नहीं जो तुम्हारे अंगों में लड़ती रहती हैं? 2 तुम लालसा करते हो और जब तुम्हें मिलता नहीं तो तुम हत्या करते हो। तुम ईर्ष्या करते हो और जब कुछ प्राप्त नहीं कर सकते तो तुम लड़ते और झगड़ते हो। तुम्हें इसलिए नहीं मिलता क्योंकि तुम माँगते नहीं। 3 तुम माँगते हो पर पाते नहीं, क्योंकि तुम बुरे उद्देश्य से माँगते हो, ताकि तुम उसे अपनी लालसाओं पर उड़ा दो। 4 हे4:4 कुछ हस्तलेखों में यहाँ "व्यभिचारियो और" लिखा है। व्यभिचारिणियो, क्या तुम नहीं जानतीं कि संसार से मित्रता का अर्थ परमेश्वर से शत्रुता रखना है? इसलिए यदि कोई संसार का मित्र बनना चाहता है, तो वह स्वयं को परमेश्वर का शत्रु बनाता है। 5 या तुम सोचते हो कि पवित्रशास्त्र व्यर्थ ही कहता है कि परमेश्वर जिसने आत्मा को हमारे भीतर बसाया है, वह उसकी तीव्र लालसा करता है। 6 क्या वह और अधिक अनुग्रह नहीं देता? इस कारण वह कहता है :
परमेश्वर अभिमानियों का विरोध करता है,
परंतु दीनों पर अनुग्रह करता है।4:6 नीति 3:34