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याकूब 4:1-6

IRVHIN Indian Revised Version (IRV) Hindi - 2019

संसार से मित्रता

1 तुम में लड़ाइयाँ और झगड़े कहाँ से आते है? क्या उन सुख-विलासों से नहीं जो तुम्हारे अंगों में लड़ते-भिड़ते हैं? 2 तुम लालसा रखते हो, और तुम्हें मिलता नहीं; तुम हत्या और डाह करते हो, और कुछ प्राप्त नहीं कर सकते; तुम झगड़ते और लड़ते हो; तुम्हें इसलिए नहीं मिलता, कि माँगते नहीं। 3 तुम माँगते हो और पाते नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग-विलास में उड़ा दो। 4 हे व्यभिचारिणियों4:4 व्यभिचारिणियों: यह शब्द उन लोगों को दर्शाने के लिये उपयोग किया गया हैं जो परमेश्वर के प्रति विश्वासघाती हैं।, क्या तुम नहीं जानतीं, कि संसार से मित्रता करनी परमेश्वर से बैर करना है? इसलिए जो कोई संसार का मित्र होना चाहता है, वह अपने आपको परमेश्वर का बैरी बनाता है। (1 यूह. 2:15,16) 5 क्या तुम यह समझते हो, कि पवित्रशास्त्र व्यर्थ कहता है? "जिस पवित्र आत्मा को उसने हमारे भीतर बसाया है, क्या वह ऐसी लालसा करता है, जिसका प्रतिफल डाह हो"? 6 वह तो और भी अनुग्रह देता है; इस कारण यह लिखा है, "परमेश्वर अभिमानियों से विरोध करता है, पर नम्रों पर अनुग्रह करता है।"

Em outras traduções

  1. OHSS Hindi Contemporary Version

    1 तुम्हारे बीच लड़ाई व झगड़े का कारण क्या है? क्या तुम्हारे सुख-विलास ही नहीं, जो तुम्हारे अंगों से लड़ते रहते हैं? 2 तुम इच्छा तो करते हो किंतु प्राप्‍त नहीं कर पाते इसलिये हत्या कर देते हो. जलन के कारण तुम लड़ाई व झगड़े करते हो क्योंकि तुम प्राप्‍त नहीं कर पाते. तुम्हें प्राप्‍त नहीं होता क्योंकि तुम मांगते नहीं. 3 तुम मांगते हो फिर भी तुम्हें प्राप्‍त नहीं होता क्योंकि मांगने के पीछे तुम्हारा उद्देश्य ही बुरी इच्छा से होता है—कि तुम उसे भोग विलास में उड़ा दो.

    4 अरे विश्वासघातियो!4:4 होशे 3:1 क्या तुम्हें यह मालूम नहीं कि संसार से मित्रता परमेश्वर से शत्रुता है? इसलिये उसने, जो संसार की मित्रता से बंधा हुआ है, अपने आपको परमेश्वर का शत्रु बना लिया है. 5 कहीं तुम यह तो नहीं सोच रहे कि पवित्र शास्त्र का यह कथन अर्थहीन है: वह आत्मा, जिसको उन्होंने हमारे भीतर बसाया है, बड़ी लालसा से हमारे लिए कामना करते हैं? 6 वह और अधिक अनुग्रह देते हैं, इसलिये लिखा है:

    "परमेश्वर घमंडियों के विरुद्ध रहते

    और दीनों को अनुग्रह देते हैं."4:6 सूक्ति 3:34

  2. HSB Hindi Standard Bible

    1 तुम्हारे बीच में लड़ाइयाँ और झगड़े कहाँ से आए? क्या यह उन लालसाओं के कारण नहीं जो तुम्हारे अंगों में लड़ती रहती हैं? 2 तुम लालसा करते हो और जब तुम्हें मिलता नहीं तो तुम हत्या करते हो। तुम ईर्ष्या करते हो और जब कुछ प्राप्‍त नहीं कर सकते तो तुम लड़ते और झगड़ते हो। तुम्हें इसलिए नहीं मिलता क्योंकि तुम माँगते नहीं। 3 तुम माँगते हो पर पाते नहीं, क्योंकि तुम बुरे उद्देश्य से माँगते हो, ताकि तुम उसे अपनी लालसाओं पर उड़ा दो। 4 हे4:4 कुछ हस्तलेखों में यहाँ "व्यभिचारियो और" लिखा है। व्यभिचारिणियो, क्या तुम नहीं जानतीं कि संसार से मित्रता का अर्थ परमेश्‍वर से शत्रुता रखना है? इसलिए यदि कोई संसार का मित्र बनना चाहता है, तो वह स्वयं को परमेश्‍वर का शत्रु बनाता है। 5 या तुम सोचते हो कि पवित्रशास्‍त्र व्यर्थ ही कहता है कि परमेश्‍वर जिसने आत्मा को हमारे भीतर बसाया है, वह उसकी तीव्र लालसा करता है। 6 क्या वह और अधिक अनुग्रह नहीं देता? इस कारण वह कहता है :

    परमेश्‍वर अभिमानियों का विरोध करता है,

    परंतु दीनों पर अनुग्रह करता है।4:6 नीति 3:34

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