संसार से मित्रता
1 तुम में लड़ाइयाँ और झगड़े कहाँ से आते है? क्या उन सुख-विलासों से नहीं जो तुम्हारे अंगों में लड़ते-भिड़ते हैं? 2 तुम लालसा रखते हो, और तुम्हें मिलता नहीं; तुम हत्या और डाह करते हो, और कुछ प्राप्त नहीं कर सकते; तुम झगड़ते और लड़ते हो; तुम्हें इसलिए नहीं मिलता, कि माँगते नहीं। 3 तुम माँगते हो और पाते नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग-विलास में उड़ा दो। 4 हे व्यभिचारिणियों4:4 व्यभिचारिणियों: यह शब्द उन लोगों को दर्शाने के लिये उपयोग किया गया हैं जो परमेश्वर के प्रति विश्वासघाती हैं।, क्या तुम नहीं जानतीं, कि संसार से मित्रता करनी परमेश्वर से बैर करना है? इसलिए जो कोई संसार का मित्र होना चाहता है, वह अपने आपको परमेश्वर का बैरी बनाता है। (1 यूह. 2:15,16) 5 क्या तुम यह समझते हो, कि पवित्रशास्त्र व्यर्थ कहता है? "जिस पवित्र आत्मा को उसने हमारे भीतर बसाया है, क्या वह ऐसी लालसा करता है, जिसका प्रतिफल डाह हो"? 6 वह तो और भी अनुग्रह देता है; इस कारण यह लिखा है, "परमेश्वर अभिमानियों से विरोध करता है, पर नम्रों पर अनुग्रह करता है।"