भविष्यद्वक्ता की व्यथा और उसकी आशा
1 उसके रोष की छड़ी से दुःख भोगनेवाला पुरुष मैं ही हूँ;
2 वह मुझे ले जाकर उजियाले में नहीं, अंधियारे ही में चलाता है;
3 उसका हाथ दिन भर मेरे ही विरुद्ध उठता रहता है।
4 उसने मेरा माँस और चमड़ा गला दिया है,
और मेरी हड्डियों को तोड़ दिया है;
5 उसने मुझे रोकने के लिये किला बनाया,
और मुझ को कठिन दुःख और श्रम से घेरा है;
6 उसने मुझे बहुत दिन के मरे हुए लोगों के समान अंधेरे स्थानों में बसा दिया है।
7 मेरे चारों ओर उसने बाड़ा बाँधा है कि मैं निकल नहीं सकता;
उसने मुझे भारी साँकल से जकड़ा है;
8 मैं चिल्ला-चिल्ला के दुहाई देता हूँ,
तो भी वह मेरी प्रार्थना नहीं सुनता;
9 मेरे मार्गों को उसने गढ़े हुए पत्थरों से रोक रखा है,
मेरी डगरों को उसने टेढ़ी कर दिया है।