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तीतुस 3

मसल-चलन

1 ों ि िा, ि िों और अधििों अधरहें, और उनकआजें, और हर एक अचिरहें, 2 िबदनकरें3:2 किसी को बदनाम न करें: हम किसी से किसी और के बारे में कुछ न कहें, जो उन्हें चोट पहुँचाए।; झगड़ाों; पर मल वभों, और सब मनों बड़ी नमरतरहें। 3 ोंि हम पहले, िि और आजनने, और रम ें पड़े , और ििरकअभिऔर ख-विसतें े, और र-भ, और करनें वन िकरते, और िे, और एक सररखते। 4 पर जब हमउदरकरपरमवर भल, और मनों पर उसकरकट 5 उसनहमउदिऔर यह िों रण नहीं, हमनआप ि3:5 यह धार्मिक कामों के कारण नहीं, जो हमने आप किए: यह सुसमाचार का एक महान और मौलिक सिद्धान्त है कि मनुष्यों के अच्छे काम आत्मा के धार्मिकता में कोई हिस्सेदारी नहीं होती हैं।, पर अपनदयअन, नयजन, और पविआतहमें नयबन6 िउसनहमउदरकरमसहम पर अधिउणा। (. 2:28) 7 िससहम उसकअनरह धरठहरकर3:7 हम उसके अनुग्रह से धर्मी ठहरकर: हम अपने कामों के द्वारा नहीं, परन्तु उनके अनुग्रह और दया के द्वारा।, अननवन आशअनिबनें।

8 यह सच ै, और ैं हतूँ, ि इन ों िषय ें इसलिि िोंपरमवर पर ििै, भले-भलों ें लगरहनरखें। ें भली, और मनों ैं।

कलह बचें

9 पर खतिों, और वलिों, और ि, और उन झगड़ों े, यवसिषय ें ों बचरह; ोंि िफल और यरैं। 10 िखणएक समझकर उससअलग रह11 यह नकर ि ऐसमनभटक गयै, और अपनआपकठहरकर करतरहतै।

अनिसन

12 जब ैं अरतििूँ, ििआनयतकरना: ोंि ैंवहीं ़ा टनिचय िै। 13 यवसपक और अपयतकरकआगपहुँे, और , ि उनें िवसघट14 हमआवशयकतकरनिअचों ें लगरहनें ि िफल रहें।

भकमन

15 सब िों नमसऔर िरण हम रखतैं, उनकनमस

सब पर अनरह रहे।

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