23 हे कपटी सासतिरी हुन अर फरीसी हुन, तुम पर धितकार! तुम पुदीने, अर सोप, अर जीरो का दसवां अंस ते दे हैं, पर तुम न नेम ख गम्भीर बातहुन ख असो कि न्याय, अर दया, अर विस्वास ख छोड़ दियो हैं; चाहनो थो कि इन ख भी कर रहनो अर उन ख भी नी छोड़ 24 अरे अंधा अगुवा हुन, तुम मच्छर ख ते छान डाल हैं, पर ऊँट ख निगल जाव हैं।
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