28 "अर तुम अपनो कपड़ा ख लाने काहे चिन्ता करह हैं? जंगल का फूल हुन पर याद कर कि वी कसो बढ़ हैं वी नी ते मेहनत करिये हैं नी काटा हैं। 29 तेबी मी तुम से कहूँ हैं कि सुलैमान भी, अपनो पूरो धन महिमा म उन म से कोई ख जसो कपड़ा पहिनो भयो नी हतो।" 30 एकोलाने जब भी परमेस्वर म बररा कि घास ख जे आज हैं अर कल आगी म डाली जाहे, असो कपड़ा पहिना हैं, ते अरे कुछ दिन ख विस्वासी हुन, तुम का उ इत्ता बढ़ ख काहे नी पहिना हे?