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उद्बोधक 12

1 जवें अपनबनरख:

अपनजवें अपनबनरखो,

इससपहलि

और वह समय आए िनमें कहनयह ो,

"इनमें नहीं,"

2 इससपहलि रज, रम

और िे,

और दल िआएे;

3 उस िपहरांपनलगेंे,

बलवे,

सतैं करनकर ेंे, ोंि कम गए ैं,

और झरों ांकतैं ी;

4 चकआवरण

नगर टक े;

और यकि उठ खड़ा ा,

तथों आवांएगी.

5 जगहों डरें

और डरवनोंे;

ें

और िउनकघसटतचल

और इचखती.

ोंि मनअपनसदघर चलएग

जबकि े-टनों ें भटकतरह े.

6 करउनकइससपहलि ां़ी ,

और कट,

रखघड़ा ि

और पहिि;

7 ि ें एगी,

और आतपरमवर एगिसनउसिा.

8 "! ै!" शनिकहतै,

"सब ै!"

शनिउद

9 िशनिों िउसनजबऔर बहिवचन इकटिा. 10 शनिमनभवनशबों और सचों िा.

11 िों ें छड़ी समैं तथिषकों ें अचगई ों सम; एक चरवगईैं. 12 ! इनकअलसरिें कस रहना;

बहतकों िखकर रखननहीं और तकों पढशरथकै.

13 इसलिइस यहै:

ि परमवर रति रदऔर भय वनरख

और उनकयवसऔर ििों लन करो,

ोंि यहहर एक मनपर ै.

14 ोंि परमवर हर एक ो,

वह ो,

भलो, उसकिकरेंे.

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