बुद्धि अऊ मुरूखता के नेवता
1 बुद्धि ह अपन घर बनाईस;
ओह येकर सात ठन खंभा बनाय हवय।
2 ओह अपन पसु के मांस रांधे हवय अऊ अंगूर के मंद तियार करे हवय;
अऊ खाना खाय बर अपन मेज म रखे हवय।
3 ओह अपन सेवकमन ला पठोय हवय,
अऊ ओह सहर के सबले ऊंच जगह ले, ये कहिके बलाथे,
4 "जऊन मन सीधा-साधा अंय, ओमन मोर घर म आवंय!"
जऊन मन निरबुद्धि अंय, ओमन ला ओह कहिथे,
5 "आवव, मोर खाना खावव
अऊ मोर तियार करे गे अंगूर के मंद ला पीयव।
6 अपन सीधा-साधा रसता ला छोंड़व, त तुमन जीयत रहिहू;
समझवाले रसता म चलव।"
10 यहोवा के भय मनई बुद्धि के सुरूआत अय,
पबितर परमेसर ला जानई समझ के बात अय।