आत्मा के वरदान
1 प्यार कि रहामैं चलत रहबौ, और आत्मिक वरदानन कि लौ मैं रहबौ; ताकि तुम खासकर भविस्यवाँड़ी करौ। 3 लेकिन जो भविस्यवाँड़ी करथैं, बे इंसानन की बढ़ोतरी और सीख और सांति के बढ़ावा की बात करथै।
24 लेकिन अगर सबै भविस्यवाँड़ी करन लगैं, और कोई अविस्वासी या आम आदमी इंसान भीतर आए पहोंचै, तौ सब बाकै कसूरवार ठहराए देंगे, और अजमाय लेंगे, 25 और बाके मन को भेद पकड़ मैं आए जागो, तौ फिर बौ मोखरा गिरकै परमेस्वर की आराधना करैगो, और मान लेगो "कि सच्ची मैं परमेस्वर तुमरे बीच मैं है!"
29 और भविस्यवक्ता मैं से भी दुई या तीन जनी बोलैं, बाकी के आदमी उनके बचन को फैसला करैं। 30 लेकिन अगर और कोई भी जो बैठो पड़ो है, परमेस्वर के घाँईं से बाकै ईस्वरीय उजीतो होबै तौ, पहलो बारो चुप हुई जाबै। 32 आत्मा को वरदान भविस्यवक्ता के बस मैं होनो चाहिए,