रास्तबाज़ होने के लिए ईमान ज़रूरी है
21 लेकिन अब अल्लाह ने हम पर एक राह का इनकिशाफ़ किया है जिससे हम शरीअत के बग़ैर ही उसके सामने रास्तबाज़ ठहर सकते हैं। तौरेत और नबियों के सहीफ़े भी इसकी तसदीक़ करते हैं। 22 राह यह है कि जब हम ईसा मसीह पर ईमान लाते हैं तो अल्लाह हमें रास्तबाज़ क़रार देता है। और यह राह सबके लिए है। क्योंकि कोई भी फ़रक़ नहीं, 23 सबने गुनाह किया, सब अल्लाह के उस जलाल से महरूम हैं जिसका वह तक़ाज़ा करता है, 24 और सब मुफ़्त में अल्लाह के फ़ज़ल ही से रास्तबाज़ ठहराए जाते हैं, उस फ़िदिये के वसीले से जो मसीह ईसा ने दिया। 25 क्योंकि अल्लाह ने ईसा को उसके ख़ून के बाइस कफ़्फ़ारा का वसीला बनाकर पेश किया, ऐसा कफ़्फ़ारा जिससे ईमान लानेवालों को गुनाहों की मुआफ़ी मिलती है। यों अल्लाह ने अपनी रास्ती ज़ाहिर की, पहले माज़ी में जब वह अपने सब्रो-तहम्मुल में गुनाहों की सज़ा देने से बाज़ रहा 26 और अब मौजूदा ज़माने में भी। इससे वह ज़ाहिर करता है कि वह रास्त है और हर एक को रास्तबाज़ ठहराता है जो ईसा पर ईमान लाया है।