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नीतिवचन 31:10-12,23,28-31

भली पत्नी

10 भली पत्नी कौण पाँ सकै सै?

क्यूँके उसका मोल तो मूँगों31:10 मूँगों मूँगा एक बेशकीमती रत्न सै तै बाध सै।

11 उसकै पति कै मन म्ह उसके प्रति बिश्वास सै,

अर उसनै लाभ की कमी न्ही होन्दी।

12 वो अपणी जिन्दगी के सारे दिनां म्ह उसतै बुरा कोनी,

बल्के भलाए बरताव करै सै।

23 जिब उसका पति सभा म्ह देश के बुजुर्गां के गैल बैठ्ठै सै,

तो उसका सम्मान होवै सै।

28 उसके बेट्टे उठ-उठकै उस ताहीं धन्य कहवै सै,

उसका पति भी उसकी उठकै उसकी इसी बड़ाई करै सै:

29 "भोत सी बिरबानियाँ नै आच्छे-आच्छे काम तो करे पर तू उन सब तै बढ़कै सै।"

30 शोभा तो झूठ्ठी अर सुन्दरता बेकार सै,

पर जो बिरबान्‍नी यहोवा का भय मान्‍नै सै, उसकी बड़ाई करी जावैगी।

31 उसके मेहनत का फळ उस ताहीं द्यों,

अर उसके काम्मां तै सभा म्ह उसकी बड़ाई होवैगी।

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