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नीतिवचन 8

ठत

1 ि ै?

समझ ्‍आवै?

2 ि ्‍जगहां ै,

अर हयाँ खड़ी ै,

3 टकां ै, ै,

अर दरब्‍आवकहवै,

4 "णसों, थमनूँ ूं,

अर णसां तर ै।

5 णसों, चतो;

अर ो, अपणमन समझ

6 ो, ूँखरकहूँी,

अर िुँ्‍ूँी, तब उस िकड़ैी;

7 ूँसच्‍िा;

टतमन्‍आवै।

8 ुँधरै,

उन ़ी उलिकडी।

9 समझदतर आस,

अर आळतर कतै।

10 ाँी, िो,

अर खरदन बढकरो।

11 ूँि, सकिमतरतां आचै,

अर मन आळिां उसकबरबर ी।

12 ि ूं, अर चतकरुँ ूं,

अर अर िूं।

13 यहभय नणखणै।

घमण, अहअर ै,

अर ां ूँ ूं।

14 बढ़िि, अर खरि ै, समझ ै,

अर पररम ै।

15 जरिकरै,

अर अधिधरसन करै;

16 जरिा,

िअर धरतकरण आळकरै।

17 करै, उनतकरुँ ूं,

अर मन्‍जतन करकतडउठकहवे, मन्‍ै।

18 धन अर न-सम,

ठहरण आळधन अर िकतै।

19 फळ खर्‍ै,

बलदन बढ़िै।

अर फसल खराँबढ़िै।

20 धर,

अर ्‍ूँ ूं8:20 मै धर्म की राह और न्याय की राह नै चलाऊ सूं

21 िसतअपणणसां धन-समपति करुँ,

अर उनकभणां भर ँ।

22 यहीं करण शर,

बलअपणशरआतां हलजणा।

23 सदबलशरधरतरचनकरण हलठहरगई ूं।

24 िगहरगर ा,

अर े, ि

25 िपहअर पह़िाँ िगई ी,

ि

26 ियहधरत

अर , िकण बणे, इनतहल

27 िउसनअकीं िकरया, तब ओड़ै ी,

िउसनगहरगर उपपर अकसमणडल ीं हरा,

28 िउसनअकसमणडल ीं उपपर िा,

अर गहरसमदर टण े,

29 िउसनसमदर हद ठहर,

उसककम उलघण कर सकै,

अर िधरतलगा,

30 रधगर8:30 प्रधान कारीगर प्यारी बच्‍ची समउसकी;

अर हर उसकी,

अर हर बखत उसकरहूँ ी।

31 उसकबसधरत

अर णसां गति ा।

32 इस करकइब ळकों, ो;

ितणधनपकड़े रहवै।

33 िो, अर ि,

उस ीं अनसकरो।

34 ितनधनणस ै,

बलहळखडरहवै,

अर दरवां खमबयाँ िांलगरहवै।

35 ूँमन्‍ै, वन ै,

अर यहउसतै।

36 पर मन्‍ूँमयै,

अपणकसकरै,

ितनै, ै।"

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