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नीतिवचन 8:1,10-13,32-36

ज्ञान की श्रेष्ठता

1 के बुद्धि कोनी पुकारै?

के समझ ऊँच्‍ची आवाज म्ह कोनी बुलावै सै?

10 चाँदी न्ही, मेरी शिक्षा नै ए चुण ल्यो,

अर खरे कुन्दन तै बढ़कै ज्ञान नै स्वीकार करो।

11 क्यूँके बुद्धि, बेसकिमती रत्नां तै भी आच्छी सै,

अर सारी मन लुभाण आळी चिज्जां म्ह तै कोए भी उसकै बराबर कोनी।

12 मै जो बुद्धि सूं, अर मै चतुराई म्ह वास करुँ सूं,

अर ज्ञान अर विवेक नै पाऊँ सूं।

13 यहोवा का भय मानणा बुराई तै बैर राखणा सै।

घमण्ड, अहंकार अर बुरी चाल तै,

अर धोक्खेबाजी की बात्तां तै भी मै बैर राक्खूँ सूं।

32 इस करकै इब हे मेरे बाळकों, मेरी सुणो;

कितणे धन्य सै वे जो मेरी राह नै पकड़े रहवै सै।

33 शिक्षा नै सुणो, अर बुद्धिमान हो जाओ,

उस ताहीं अनसुणी ना करो।

34 कितना धन्य सै वो माणस जो मेरी सुणै,

बल्के मेरी देहळी पै रोज खड्या रहवै,

अर मेरै दरवाजां के खम्बयाँ के धोरै निगांह लगाऐ रहवै सै।

35 क्यूँके जो मन्‍नै पावै सै, वो जीवन पावै सै,

अर यहोवा उसतै राज्जी होवै सै।

36 पर जो मन्‍नै ढूँढ़ण म्ह नाकामयाब हो जावै सै,

वो अपणा ए नुकसान करै सै,

जितने मेरै तै बैर राक्खै सै, वे मौत तै मोह राक्खै सै।"

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