33 अपनु घरबार बेच़तां धर्मरथ देथ, ते एप्पू जो अक बेटवो बनाथ, ज़ै पुरानो न भोए, सुर्गे मां दौलत जम्हां केरा ज़ै कधे न मुक्के, ज़ैड़ी न च़ोर पुज़्ज़े ते न कीड़ो खाए। 34 किजोकि ज़ैड़ी तेरी दौलत भोल्ही, तैड़ी तेरो दिल भी लग्गेलो।
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33 अपनु घरबार बेच़तां धर्मरथ देथ, ते एप्पू जो अक बेटवो बनाथ, ज़ै पुरानो न भोए, सुर्गे मां दौलत जम्हां केरा ज़ै कधे न मुक्के, ज़ैड़ी न च़ोर पुज़्ज़े ते न कीड़ो खाए। 34 किजोकि ज़ैड़ी तेरी दौलत भोल्ही, तैड़ी तेरो दिल भी लग्गेलो।