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Proverbs 31

णवपत्‍

10 पत्‍सकतै?

उसकरत्‍ों बहअधिै।

11 उसकपति मन ें उसकरति ि्‍ै,

और उसिउततम वसघटनहीं ी।

12 वह ्‍अपनवन भर उससनहीं,

बलि भलयवहकरतै।

13 वह ऊन और सन ूँढ़तै,

और रसन्‍वक अपनों करतै।

14 वह जहों सम

अपनजन-वसर-दै।

15 फटनपहल

वह गकर अपनघर ों जन ि

और अपनिों ाँटतै।

16 वह िकरकिखरै;

वह अपनकमलगै।

17 वह करनिअपनकमर कसतै,

और अपनाँों बनै।

18 वह अपनाँै,

और तक उसकपक जलतरहतै।

19 वह तकलचलिअपनबढ़ै;

और उसकचरखपकड़रहतैं।

20 वह ों िअपनै,

और दरिसहयतिअपनबढ़ै।

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