40मकनदबै, सासै, सारै
41'अज़रिएल और सलमियाह, समरियाह,
42सलूम, अमरियाह, यूसुफ़।
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40मकनदबै, सासै, सारै
41'अज़रिएल और सलमियाह, समरियाह,
42सलूम, अमरियाह, यूसुफ़।
16ख़ुदावन्द का दहना हाथ बुलन्द हुआ है,ख़ुदावन्द का दहना हाथ दिलावरी करता है।
20ख़ुदावन्द का फाटक यही है,सादिक इससे दाख़िल होंगे।
25आह! ऐ ख़ुदावन्द बचा ले!आह! ऐ ख़ुदावन्द खु़शहाली बख़्श!
10अब ख़ुदा जो हर तरह के फ़ज़ल का चश्मा है, जिसने तुम को मसीह ईसा में अपने अबदी जलाल के लिए बुलाया, तुम्हारे थोड़ी मुद्दत तक दुःख उठाने के बाद आप ही तुम्हें कामिल और क़ाईम और मज़बूत करेगा।
11हमेशा से हमेशा तक उसी की सल्तनत रहे। आमीन।
14मुहब्बत से बोसा ले लेकर आपस में सलाम करो।तुम सबको जो मसीह में हो, इत्मीनान हासिल होता रहे।
11'और सलामती के ज़बीहे के बारे में जिसे कोई ख़ुदावन्द के सामने चढ़ाए शरा' यह है,
32और तुम सलामती के ज़बीहों की दहनी रान उठाने की क़ुर्बानी के तौर पर काहिन को देना।
37सोख़्तनी क़ुर्बानी, और नज़्र की क़ुर्बानी, और ख़ता की क़ुर्बानी, और जुर्म की क़ुर्बानी, और तख़्सीस और सलामती के ज़बीहे के बारे में शरा' यह है।
11ऐ ख़ुदावन्द! तू मुझ पर रहम करने में दरेग़ न कर;तेरी शफ़क़त और सच्चाई बराबर मेरी हिफ़ाज़त करें!
13ऐ ख़ुदावन्द! मेहरबानी करके मुझे छुड़ा।ऐ ख़ुदावन्द! मेरी मदद के लिए जल्दी कर।
17लेकिन मैं ग़रीब और मोहताज हूँ,ख़ुदावन्द मेरी फ़िक्र करता है।मेरा मददगार और छुड़ाने वाला तू ही है;ऐ मेरे ख़ुदा! देर न कर।
16इद्दू से ज़करियाह; जिन्नतून से मुसल्लाम:
18बिलजाह से सम्मू’आ; समा’याह से यहूनतन;
20सल्लै से कल्लै; 'अमोक से इब्र;
4मसीह ही तुम्हारी ज़िन्दगी है। जब वह ज़ाहिर हो जाएगा तो तुम भी उस के साथ ज़ाहिर हो कर उस के जलाल में शरीक हो जाओगे।
12ख़ुदा ने तुम को चुन कर अपने लिए ख़ास — और पाक कर लिया है। वह तुम से मुहब्बत रखता है। इस लिए अब तरस, नेकी, फ़रोतनी, नर्मदिल और सब्र को पहन लो।
15मसीह की सलामती तुम्हारे दिलों में हुकूमत करे। क्यूँकि ख़ुदा ने तुम को इसी सलामती की ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए बुला कर एक बदन में शामिल कर दिया है। शुक्रगुज़ार भी रहो।
11या मंतरी या जिन्नात का आशना या रम्माल या साहिर हो।
13तू ख़ुदावन्द अपने ख़ुदा के सामने कामिल रहना।
15ख़ुदावन्द तेरा ख़ुदा तेरे लिए तेरे ही बीच से, या’नी तेरे ही भाइयों में से मेरी तरह एक नबी खड़ा करेगा तुम उसकी सुनना;
25हरोदी सम्मा, हरोदी इलिका।
32सा’लाबूनी इलीयाब, बनी यासीन यूनतन।
33हरारी सम्मा, अख़ीआम बिन सरार हरारी।
1ऐ सब उम्मतो, यह सुनो।ऐ जहान के सब बाशिन्दो, कान लगाओ!
15लेकिन ख़ुदा मेरी जान को पाताल के इख़्तियार से छुड़ा लेगा,क्यूँकि वही मुझे कु़बूल करेगा। सिलाह
18चाहे जीते जी वह अपनी जान को मुबारक कहता रहा होऔर जब तू अपना भला करता है तो लोग तेरी तारीफ़ करते हैं
3मेरी जान भी बहुत ही बेक़रार है;और तू ऐ ख़ुदावन्द, कब तक?
4लौट ऐ ख़ुदावन्द, मेरी जान को छुड़ा।अपनी शफ़क़त की ख़ातिर मुझे बचा ले।
5क्यूँकि मौत के बाद तेरी याद नहीं होती,क़ब्र में कौन तेरी शुक्रगुज़ारी करेगा?
4इंसान बुतलान की तरह है;उसके दिन ढलते साये की तरह हैं।
7ऊपर से हाथ बढ़ा, मुझे रिहाई दे और बड़े सैलाब,या’नी परदेसियों के हाथ से छुड़ा।
15मुबारक है वह क़ौम जिसका यह हाल है।मुबारक है वह क़ौम जिसका ख़ुदा ख़ुदावन्द है।