6पस ख़ुदा के मज़बूत हाथ के नीचे फ़रोतनी से रहो, ताकि वो तुम्हें वक़्त पर सरबलन्द करे।
11हमेशा से हमेशा तक उसी की सल्तनत रहे। आमीन।
14मुहब्बत से बोसा ले लेकर आपस में सलाम करो।तुम सबको जो मसीह में हो, इत्मीनान हासिल होता रहे।
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6पस ख़ुदा के मज़बूत हाथ के नीचे फ़रोतनी से रहो, ताकि वो तुम्हें वक़्त पर सरबलन्द करे।
11हमेशा से हमेशा तक उसी की सल्तनत रहे। आमीन।
14मुहब्बत से बोसा ले लेकर आपस में सलाम करो।तुम सबको जो मसीह में हो, इत्मीनान हासिल होता रहे।
4मसीह ही तुम्हारी ज़िन्दगी है। जब वह ज़ाहिर हो जाएगा तो तुम भी उस के साथ ज़ाहिर हो कर उस के जलाल में शरीक हो जाओगे।
15मसीह की सलामती तुम्हारे दिलों में हुकूमत करे। क्यूँकि ख़ुदा ने तुम को इसी सलामती की ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए बुला कर एक बदन में शामिल कर दिया है। शुक्रगुज़ार भी रहो।
16तुम्हारी ज़िन्दगी में मसीह के कलाम की पूरी दौलत घर कर जाए। एक दूसरे को हर तरह की हिक्मत से तालीम देते और समझाते रहो। साथ साथ अपने दिलों में ख़ुदा के लिए शुक्रगुज़ारी के साथ ज़बूर, हम्द — ओ — सना और रुहानी गीत गाते रहो।
40मकनदबै, सासै, सारै
41'अज़रिएल और सलमियाह, समरियाह,
42सलूम, अमरियाह, यूसुफ़।
11'और सलामती के ज़बीहे के बारे में जिसे कोई ख़ुदावन्द के सामने चढ़ाए शरा' यह है,
13और सलामती के ज़बीहे की क़ुर्बानी के साथ जो शुक्राने के लिए होगी, वह ख़मीरी रोटी के गिर्द अपने हदिये पर पेश करे।
32और तुम सलामती के ज़बीहों की दहनी रान उठाने की क़ुर्बानी के तौर पर काहिन को देना।
3मेरी जान भी बहुत ही बेक़रार है;और तू ऐ ख़ुदावन्द, कब तक?
4लौट ऐ ख़ुदावन्द, मेरी जान को छुड़ा।अपनी शफ़क़त की ख़ातिर मुझे बचा ले।
9खूदावन्द ने मेरी मिन्नत सुन ली;ख़ुदावन्द मेरी दुआ क़ुबूल करेगा।
35बिन सूफ़ बिन इल्क़ाना बिन महत बिन 'अमासी।
36बिन इल्क़ाना बिन यूएल बिन 'अज़रियाह बिन सफ़नियाह।
46बिन अमसी बिन बानी बिन सामर।
11नवीं यशू’आ की, दसवीं सिकानियाह की,
22इज़हारियों में से सलूमोत, बनी सलूमोत में से यहत।
24बनी उज़्ज़ीएल में से:मीकाह; बनी मीकाह में से:समीर।
11या मंतरी या जिन्नात का आशना या रम्माल या साहिर हो।
13तू ख़ुदावन्द अपने ख़ुदा के सामने कामिल रहना।
15ख़ुदावन्द तेरा ख़ुदा तेरे लिए तेरे ही बीच से, या’नी तेरे ही भाइयों में से मेरी तरह एक नबी खड़ा करेगा तुम उसकी सुनना;
18'ला’नत उस पर जो अन्धे को रास्ते से गुमराह करे। और सब लोग कहें, 'आमीन।
21'ला’नत उस पर जो किसी चौपाए के साथ जिमा’अ करे। और सब लोग कहें, 'आमीन।
23'ला’नत उस पर जो अपनी सास से मुबाश्रत करे। और सब लोग कहें, 'आमीन।
16इद्दू से ज़करियाह; जिन्नतून से मुसल्लाम:
18बिलजाह से सम्मू’आ; समा’याह से यहूनतन;
20सल्लै से कल्लै; 'अमोक से इब्र;
4तू जलाली है, और शिकार के पहाड़ों से शानदार है।
9जब ख़ुदा 'अदालत करने को उठा,ताकि ज़मीन के सब हलीमों को बचा ले। सिलाह
11ख़ुदावन्द अपने ख़ुदा के लिए मन्नत मानो, और पूरी करो,और सब जो उसके गिर्द हैं वह उसी के लिए जिससे डरना वाजिब है, हदिए लाएँ।